2013 - Rajput Unity
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साधुओँ के प्रति हमारे दायित्व

Written By Unknown on Tuesday, June 11, 2013 | 10:43 PM

sampurn sansar m bharat bhumi dev bhumi k rup me sarvatr vikhyat rahi h anadikal s sanatan dharm ki punya dhara yaha sattm pravahit hoti rahi h samya samya par jagdishvar sawam nar rup me avtarit hokar satvik dhara prvahit karke gaye rishi muni evam santjano dwara bhakti ki punyamayi dhara aviral apne sandesho dwara pravahit rakhi h agyan , papachar , dushkarm ka samajik unmulan karne m sant jano ka atyant mahatpurn yogdan raha h barbar janam maran ke dushchakra s sada sarvada mukti ka path keval humare santjano n hi chirantar shashvat param bharm k sakshatkar k rup m darshaya h bharat bhumi k alwa kahi b jivan ki kshanbhangurta ka rahsay evam usme mukti ka aisa sandesh kahi b nahi milta sabhi pantho me ishvar k dut ki parikalpna h kintu is dhara dham par to swam bhagwan avtarit hue h

yah sanatan dharm ki vishsta h ki yha bhinn bhinn samya par bhinn bhinn rupo m santo ne samaj ko ishvar sakshatkar janam marn s chutkara pane sandesh alag alag bhashao m samaj k sabhi vargo hetu sahaj rup m pradan kiya
aisi sthiti m hum samajik praniyo ka b kuch kartavya banta h hume unki pratistha evam prerna dono ko dhyan m rakhkar santo k prati aachran karna chahiye is ghor kalyug me jaha papachar nirantar prvahit h vaha hume keval namadhar par nirbhar rahna padta h vah keval prabhu v guru ki kripa s hi sambhavit h us prerna ko sakar karne me santo ka vishes yogdan h hume jaha ek or santo ki man maryada evam pratistha rakhne m apni or s tan man dhan s pryas karne chahiye vahi unki prerna rupi shasvat stya ko apne vahvahar m utarkar apne jivan ko dhany banana karna chahiye
bin hari kripa milahi nahi santa

aisa kehte h ki jb hume santo ka sang mil raha to unke dwara bataye gaye marg par chalne ka anusaran karne ka nirbadh paryas karna humara dayitv h keval sadhu seva ka arth rupya , sharm rup m hi nahi apitu man m anusharan karte hue apni dincharya nidharit karni chahiye mansa vacha karmna nishpap aachran evam prabhu bhajan tatha sadhu satsang s hi jivan dhanya ho sakta h anya koi vikalp nahi h bhagvan ka samran karne wala har samya santust rahne vala puja karne vala bhagvan ka bhakt anayas hi chandal tak ko b pavitra kar deta h


Rahul singh shekhawat

क्या आपको शर्म आती है ?

आपने दुकान से चार रुपये की सिगरेट खरीदी बडी । शान से । यह क्या कर रहे है आप ? छि माचिस मांग रहे है एक रिक्शा चालक से जो बडी मेहनत करके माचिस खरीदता है । उस माचिस से आपने सिगरेट सुलगाइ है । सोचो कितना घृणित काम किया है आपने जहरीला धुँआ छोडा है । यही धुँआ अगर आपके दो माह के बच्चो के नाको मे चला जाता तो आप सोचो उसकी क्या हालत होती शायद वो मर भी जाता । जब यह धुँआ इतना घातक है तो फिर आप क्यो पिते हो । आप तो शिझित है । आपको तो ज्ञानी बनने का अंहकार है आप वाकपटुटा से सबको तो चुप करा देते हो फिर चुप क्यो बैठे हो पीये जा रहे हो जहर अपने साथ साथ निरपराध लोगो को भी धुँआ छोडकर मार रहे हो । कुछ तो शरम करो आधुनिक समाज के कर्णधार । क्या आप दुसरे लोगो को सताने के लिए ही इस धरा पर आये हो ?

यह दुसरा सज्ज़न अपनी पाकेट से क्या निकाल रहे है अरे यह तो आपसे भी गये गुजरे निकले इनके हाथ मेँ तो खैनी है केँसर को निमन्त्रण दे रहे है इनके मुंह की दुर्गन्ध के मारे इनके दोस्त इनसे नफरत करते है लेकिन दोस्ती के कारण कुछ कहते नही । इस खैनी और गोबर मेँ कोई फर्क नहीँ जिसको कुछ समय पहले शान से गाल मेँ दबाये बैठे थे । और जनाब अब तो आपके बच्चे भी चुपके से आपकी पैकेट से निकालकर सेवन करने लग गये । पुरे परीवार का कल्याण कर दिया ।

अबकी बार इनके सरताज आ रहे है आप देखिये किस प्रकार झुमते हुये आ रहे है । हाथ पैर ढीले पड गये लगता है इनके सर मेँ कीड़े चढ़ गये सत्य भी है जिस परीवार का मुखिया शराब का आदी हो जाये तो उस परीवार के अन्दर कीड़े ही पड जाते है शराबी के परीवार को खोने के अलावा कुछ नही मिलता न खाने को न सोने को इस शराबी के परिवार से लक्ष्मी रूठ जाती है और इनके परीवार शनै : शैनः दरिद्रता से मर जाते है ।

महाराणा प्रताप की जयंती पर प्याऊ का आयोजन करना


 महाराणा प्रताप की जयंती पर  प्याऊ  का आयोजन






 महाराणा प्रताप की जयंती पर  प्याऊ  का आयोजन करना बेहद  सुखद और  अच्छा   रहा   जो  भी  पानी पिने आया  अपनी दुआ देकर 
 गया  
 चलते हुए राहगीरों को  मीठे ठन्डे पानी से अपनी प्यास  भुझाते हुए देखकर  ऐसा सुकून मिल रहा था  जैसे मानो  हम बड़े पुन्य का काम कर रहे हो  हमने सब कुछ हासिल कर   लिया  
 आगे  भी   चाह  हैं  की ऐसे ही  प्रयास करते रहे  गरीब जनता की सेवा करते रहे  उनका साथ  दे  क्युकी गरीब ही गरीब के लिए कुछ करता हैं

बेमतलब  की  रैली का आयोजन करना    , किसी पार्टी का विरोध  करना  ,  पुतले जलाना  , आन्दोलन करना   ये काम नेता लोग करते हैं  फिजुलखर्ची  के काम  लगते  हैं
किसी को कोई फायदा मिलता हो या कोई गरीब  दुआ देता   होगा सब  पीछे से  गाली और  बदुआ देते हैं 
मुझे तो  प्याऊ  जैसे काम करना  वाकई  में बहुत अच्छा लगा  बहुत ख़ुशी मिली   और आगे भी इसी प्रकार कार्य करते रहेंगे जिससे किसी की तो   हो  किसी गरीब की दुआ मिले 

राहुल सिंह शेखावत  एवं   समस्त  कार्यकर्त्ता 

(जय राजपुताना संघ )

रजवाडी आन बान सान साफा ( पगड़ी)

Written By Unknown on Thursday, June 6, 2013 | 9:44 PM

 

 

पगड़ी का इस्तेमाल हमारे देश में सदियों से होता आया है | प्राचीन काल से ही हमारे यहाँ पगड़ी को व्यक्तित्व,आन,बान,शान और हैसियत का प्रतीक माना जाता रहा है | पगड़ी हमारे देश में चाहे हिन्दू शासक रहें हों या मुस्लिम शासक सभी की प्रिय रही है | आज भी पगड़ी को इज्जत का परिचायक समझा जाता है | पगड़ी को किसी के आगे रख देना सर झुकाना व उसकी अधीनता समझना माना जाता है |
महाराणा प्रताप ने वर्षों में जंगल में रहना पसंद किया पर  अकबर के आगे अपनी पगड़ी न झुका कर मेवाड़ी पाग (पगड़ी )की हमेशा लाज रखी | राजस्थान में हर वर्ग व जाति समुदाय अपनी अपनी शैली में सिर पर पगड़ी बांधते है ,राजपूत समुदाय में इसी पगड़ी को साफा कह कर पुकारा जाता है ,राजपूत समाज में साफों के अलग-अलग रंगों व बाँधने की अलग-अलग शैली का इस्तेमाल समय समय के अनुसार होता है जैसे - युद्ध के समय राजपूत सैनिक केसरिया साफा पहनते थे अत: केसरिया रंग का साफा युद्ध और शौर्य का प्रतीक बना |
आम दिनों में राजपूत बुजुर्ग खाकी रंग का गोल साफा सिर पर बांधते थे तो विभिन्न समारोहों में पचरंगा,चुन्दडी,लहरिया आदि रंग बिरंगे साफों का उपयोग होता था | सफ़ेद रंग का साफा शोक का पर्याय माना   जाता है इसलिए राजपूत समाज में सिर्फ शोकग्रस्त व्यक्ति ही सफ़ेद साफा पहनता है | लेकिन पिछले कुछ सालों में आधुनिकता की दौड़ में राजस्थान की युवा पीढ़ी अपनी इस परम्परा से विमुख होती गयी और वो साफा बंधना भी भूल गयी पर धीरे धीरे वर्तमान पीढ़ी को अपनी गलती महसूस हुई पर जब तक बहुत देर हो चुकी थी गांवों में तो फिर कुछ लोग थे जिन्हें परम्परागत साफा बांधना आता था पर शहरों में तो शादी ब्याह के अवसर पर भी साफा बाँधने वालों को तलाश करना पड़ता था |
इसी कमी को पूरा करने के लिए शहरों में साफा बाँधने वालों की मांग ने इसे व्यवसायिक बना दिया और इस व्यवसाय को सही दिशा दी जोधपुर के शेर सिंह राठौड़ ने | शेर सिंह राठौड़ में राजस्थान की हर शैली में बंधे बंधाये साफे उपलब्ध कराने शुरू किये तो राजस्थान की वर्तमान पीढ़ी खास कर राजपूत समुदाय के युवाओं ने इसे हाथों हाथ लिया | राजपूत युवाओं के प्रेरणा श्रोत उच्च शिक्षित व बाड़मेर के पूर्व सांसद स्व.तन सिंह जी हमेशा खाकी साफा पहनते थे सार्वजानिक जीवन में खाकी साफा पहनने उनकी उस विरासत को पूर्व केन्द्रीय मंत्री स्व.कल्याण सिंह जी कालवी ने व उनके पुत्र करणी सेना के प्रधान व कांग्रेस नेता श्री लोकेन्द्र सिंह ने बरक़रार रखी |

आज शेर सिंह राठौड़ के प्रयासों से राजस्थानी साफे ने सिर्फ राजस्थान में ही अपना खोया गौरव प्राप्त नहीं किया बल्कि विदेशों में भी लोकप्रियता हासिल कर ग्लोबल होने की राह पर अग्रसर हैरजवाडी आन बान सान

 

 

""श्री श्री 108 ""

Written By Unknown on Monday, February 11, 2013 | 10:07 AM

हमारे हिन्दू धर्म के किसी भी शुभ कार्य, पूजा , अथवा अध्यात्मिक व्यक्ति के नाम के पूर्व ""श्री श्री 108 "" लगाया जाता है...!

लेकिन क्या सच में आप जानते हैं कि.... हमारे हिन्दू धर्म तथा ब्रह्माण्ड में 108 अंक का क्या महत्व है....?????

दरअसल.... वेदान्त में एक""मात्रक विहीन सार्वभौमिक ध्रुवांक 108 "" का उल्लेख मिलता है.... जिसका अविष्कार हजारों वर्षों पूर्व हमारे
ऋषि-मुनियों (वैज्ञानिकों) ने किया थाl

आपको समझाने में सुविधा के लिए मैं मान लेता हूँ कि............ 108 = ॐ (जो पूर्णता का द्योतक है).
अब आप देखें .........प्रकृती ­ में 108 की विविध अभिव्यंजना किस प्रकार की है।

1. सूर्य और पृथ्वी के बीच की दूरी/सूर्य का व्यास = 108 = 1 ॐ
150,000,000 km/1,391,000 km = 108 (पृथ्वी और सूर्य के बीच 108 सूर्य सजाये जा सकते हैं)

2. सूर्य का व्यास/ पृथ्वी का व्यास = 108 = 1 ॐ
1,391,000 km/12,742 km = 108 = 1 ॐ
सूर्य के व्यास पर 108 पृथ्वियां सजाई सा सकती हैं .

3. पृथ्वी और चन्द्र के बीच की दूरी/चन्द्र का व्यास = 108 = 1 ॐ
384403 km/3474.20 km = 108 = 1 ॐ
पृथ्वी और चन्द्र के बीच 108 चन्द्रमा आ सकते हैं .

4. मनुष्य की उम्र 108 वर्षों (1ॐ वर्ष) में पूर्णता प्राप्त करती है .
क्योंकि... वैदिक ज्योतिष के अनुसार.... मनुष्य को अपने जीवन काल में
विभिन्न ग्रहों की 108 वर्षों की अष्टोत्तरी महादशा से गुजरना पड़ता है .

5. एक शांत, स्वस्थ और प्रसन्न वयस्क व्यक्ति 200 ॐ श्वास लेकर एक दिन पूरा करता है .
1 मिनट में 15 श्वास >> 12 घंटों में 10800 श्वास >> दिनभर में 100 ॐ श्वास, वैसे ही रातभरमें 100 ॐ श्वास

6. एक शांत, स्वस्थ और प्रसन्न वयस्क व्यक्ति एक मुहुर्त में 4 ॐ ह्रदय की धड़कन पूरी करता है .
1 मिनट में 72 धड़कन >> 6 मिनटमें 432 धडकनें >> 1 मुहूर्त में 4 ॐ धडकनें ( 6 मिनट = 1 मुहूर्त)

7. सभी 9 ग्रह (वैदिक ज्योतिष में परिभाषित) भचक्र एक चक्र पूरा करते समय 12 राशियों से होकर गुजरते हैं और 12 x 9 = 108 = 1 ॐ

8. सभी 9 ग्रह भचक्र का एक चक्कर पूरा करते समय 27 नक्षत्रों को पार करते
हैं... और, प्रत्येक नक्षत्र के चार चरणहोते हैं और 27 x 4 = 108 = 1 ॐ

9. एक सौर दिन 200 ॐ विपल समय में पूरा होता है. (1 विपल = 2.5 सेकेण्ड)
1 सौर दिन (24 घंटे) = 1 अहोरात्र = 60 घटी = 3600 पल = 21600 विपल = 200 x 108 = 200 ॐ विपल
@@@@ उसी तरह ..... 108 का आध्यात्मिक अर्थ भी काफी गूढ़ है..... और,

1 ..... सूचित करता है ब्रह्म की अद्वितीयता/ ­एकत्व/पूर्णता को

0 ......... सूचित करता है वह शून्य की अवस्था को जो विश्व की अनुपस्थिति मेंउत्पन्न हुई होती

8 ......... सूचित करता है उस विश्व की अनंतता को जिसका अविर्भाव उस शून्य में ब्रह्म की अनंत अभिव्यक्तियों से हुआ है .
अतः ब्रह्म, शून्यता और अनंत विश्व के संयोग को ही 108 द्वारा सूचित किया गया है .

इस तरह हम कह सकते हैं कि.....जिस प्रकार ब्रह्म की शाब्दिक अभिव्यंजना
प्रणव ( अ + उ + म् ) है...... और, नादीय अभिव्यंजना ॐ की ध्वनि है.....
ठीक उसी उसी प्रकार ब्रह्म की""गाणितिक अभिव्यंजना 108 "" है।

जय क्षात्र सनातन धर्म की।

____द्वारा____ गजराज सिँहजी मेडतिया ___ठिकाना जाखली___

आर्यावर्त


आर्यावीरो ने जब वैदिक साम्राज्य बनाया था अनार्यों के हृदय में खौफ समाया थाँ।

आर्यो के शौर्य से ही विश्व सुरक्षित हो पाया था सुख समृद्धि शान्ति में जन-२ आनंदित हो पाया था।

रावण जैसे असुर ने जब सर उठाया था राम नाम के आर्यवीर ने उसका शीश गिराया था।

कंश नाम के दुष्ट ने जब अनार्यत्व दिखाया था कृष्ण नाम के आर्य योगी ने उसका अहंकार गिराया था।

अल्क्षेमेंद्र भी आर्यवर्त आ के घबराया था दक्षिण से भाग क
े अपने प्राण बचाया था।

अकबर नाम के धूर्त ने जब आर्यो से आँख मिलाया था प्रताप नाम के आर्यवीर ने मुगलो की सेना को दहलाया था।

औरंगजेब नाम के राक्षस ने जब अत्याचार बढ़ाया था
आर्यवीर शिवा ने उसको पाताल दिखाया था।

जब अज्ञानता का बादल आर्यावर्त पर छाया था तब वेदों के अज्ञान को दूर करने महर्षि दयानंद आया था।

जब पश्चिम से गोरो का दल आर्यावर्त आया था राम प्रसाद बिस्मिल नाम के अर्यावीर ने उनको उनका स्थान बताया था।

अब आर्यवीर बनने की हमारी बारी हैं राष्ट्र को आर्य बनाने की हमारी जिम्मेदारी हैं।

अब भगवे झंडे को विश्व राष्ट्र में लहराने की तैयारी हैं।

अब पुनः वैदिक साम्राज्य खड़ा करने कीहमारी बारी हैं।।

Misteri

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